सरलता के सहारे हत्या - Killing Hindi on the name of simplification

रविवार, 27 मई 2012

आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन
सरलता के सहारे हत्या  - Killing Hindi on the name of simplification
 Dr.Kavita Vachaknavee 

@ "हिन्दी भारत"
पिछले दिनों राजभाषा के नीति-निर्देशों को लेकर गृह मंत्रालय का एक जो नया ' परिपत्र ' प्रकाश में आया है (क्लिक - "हिन्दी पर सरकारी हमले का आखिरी हथौड़ा" ) , उसने भाषा के संबंध में निश्चय ही एक नये 'विमर्श' को जन्म दे दिया है। क्योंकि, भाषा केवल 'सम्प्रेषणीयता' का माध्यम भर नहीं है, बल्कि वह मनुष्य का सामाजिक-सांस्कृतिक आविष्कार भी है। फिर क्या किसी भी राष्ट्र की भाषा की संरचना में मनमाने ढंग से छेड़छाड़ की जा सकती है ? क्या वह मात्र एक सचिव और समिति के सहारे हाँकी जा सकती है ? निश्चय ही इस प्रश्न पर समाजशास्त्री, शिक्षा-शास्त्री, संस्कृतिकर्मी और राजनीतिक विद्वानों को बहस के लिए आगे आना चाहिए। यहाँ प्रस्तुत है , इस प्रसंग में एक बौध्दिक-जिरह ( Tark)   को जन्म देने वाली कथाकारप्रभु जोशी की टिप्पणी
सरलता के सहारे हत्या की हिकमत
- प्रभु जोशी
भारत-सरकार के गृह-मंत्रालय की सेवा-निवृत्त होने जा रही एक सचिव सुश्री वीणा उपाध्याय ने जाते-जाते राजभाषा संबंध नीति-निर्देशों के बारे में एक ताजा-परिपत्र जारी किया कि बस अंग्रेजी अखबारों की तो       पौ-बारह हो गयी। उनसे उनकी खुशी संभाले नहीं संभल पा रही है। क्योंकि, वे बखूबी जानते हैं कि बाद ऐसे फरमानों के लागू होते ही हिन्दी, अंग्रेजी के पेट में समा जायेगी। दूसरी तरफ हिन्दी के वे समाचार-पत्र, जिन्होंने स्वयं को 'अंग्रेजी-अखबारों के भावी पाठकों की नर्सरी' बनाने का संकल्प ले रखा है, उनकी भी बांछें खिल गयीं और उन्होंने धड़ाधड़ परिपत्र का स्वागत करने वाले सम्पादकीय लिख डाले। वे खुद उदारीकरण के बाद से आमतौर पर और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल करने के बाद से खासतौर पर अंग्रेजी की भूख बढ़ाने का ही काम करते चले आ रहे हैं।
ऐसे में 'अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष' के अघोषित एजेण्डे को लागू करने वाले दलालों के लिए तो इस परिपत्र से 'जश्न-ए-कामयाबी'( Vijay Samoroh)   का ठीक ऐसा ही समां बंध गया होगा, जब अमेरिका का भारत से परमाणु-संधि का सौदा सुलट गया था। दरअस्ल, देखने में बहुत सदाशयी-से जान पड़ने वाले इस संक्षिप्त से परिपत्र के निहितार्थ नितान्त दूसरे हैं, जिसके परिणाम लगे-हाथ सरकारी दफ्तरों में दिखने लगेंगे। बहरहाल यह किसी सरकारी कारिन्दे का रोजमर्रा निकलने वाला 'कागद' नहीं, भाषा सम्बन्धी एक बड़े 'गुप्त-एजेण्डे' को पूरा करने का प्रतिज्ञा-पत्र है।
दरअस्ल, चीन की भाषा 'मंदारिन' के बाद दुनिया की 'सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा-हिन्दी' से डरी हुई, अपना 'अखण्ड उपनिवेश बनाने वाली अंग्रेजी' ने, 'जोशुआ फिशमेन' की बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए, 'उदारीकरण' के शुरू किये जाने के बस कुछ ही समय पहले एक 'सिद्धान्तिकी' तैयार की थी, जो ढाई-दशक से 'गुप्त' थी, लेकिन 'इण्टरनेटी-युग' में वह सामने आ गयी। इसका नाम था, 'रि-लिंग्विफिकेशन'।
अंग्रेज शुरू से भारतीय भाषाओं को भाषाएँ न मान कर उनके लिए 'वर्नाकुलर' शब्द कहा करते थे। वे अपने बारे में कहा करते थे, 'वी आर अ नेशन विथ लैंग्विज, व्हेयरएज दे आर ट्राइब्स विद डॉयलेक्ट्स।' फिर हिन्दी को तो तब खड़ी 'बोली' ही कहा जा रहा था। लेकिन, दुर्भाग्यवश एक गुजराती-भाषी मोहनदास करमचंद गांधी ने इसे अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई में 'प्रतिरोध' की भाषा बना दिया और नतीजतन, गुलाम भारत के भीतर एक 'जन-इच्छा' पैदा हो गयी कि इसे हम 'राष्ट्रभाषा' बनाएँ और कह सकें 'वी आर अ नेशन विद लैंग्विज'। लेकिन, 'राष्ट्रभाषा' के बजाय वह केवल 'राजभाषा' बनकर रह गयी। यह भी एक काँटा बन गया।
बहरहाल, चौंसठ वर्षों से सालते रहने वाले काँटे को कहीं अब जाकर निकालने का साहस बटोरा जा सका है। यह एक बहुत ही दिलचस्प बात है कि अभी तक, पिछले पचास बरस से हिन्दी में जो शब्द चिर-परिचित बने चले आ रहे थे, पिछले कुछ वर्षों में उभरे 'उदारीकरण' के चलते अचानक 'कठिन' 'अबोधगम्य' और टंग-ट्व्स्टिर हो गये। परिपत्र में पता नहीं हिन्दी की किस पत्रिका के उदाहरण से समझाया गया है, कि 'भोजन' के बजाय 'लंच', 'क्षेत्र' के बजाय 'एरिया', 'छात्र' के बजाय 'स्टूडेण्ट', 'परिसर' के बजाय 'कैम्पस', 'नियमित' की जगह 'रेगुलर', 'आवेदन' के बजाय 'अप्लाई', 'महाविद्यालय' के बजाय 'कॉलेज', 'क्षेत्र' की जगह 'एरिया' आदि-आदि हैं, जो 'बोधगम्य' है ?
हिन्दी के 'सरकारी हितैषियों का मुखौटा' लगाने वाले लोग निश्चय ही पढ़े-लिखे लोग हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि भाषाएँ कैसे मरती हैं और उन्हें कैसे मारा जाता हैं। बीसवीं शताब्दी में अफ्रीकी महाद्वीप की तमाम भाषाओं का खात्मा करके उसकी जगह अंग्रेजी को स्थापित करने की रणनीति उन्हें भी बेहतर ढंग से पता होगी। उसको कहते हैं, 'थिअरी ऑव ग्रेजुअल एण्ड स्मूथ-लैंग्विज शिफ्ट'। इसके तहत सबसे पहले 'चरण' में शुरू किया जाता है- 'डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि'। अर्थात 'स्थानीय-भाषा' के शब्दों को 'वर्चस्ववादी-भाषा' के शब्दों से विस्थापित करना । बहरहाल, परिपत्र में सरलता के बहाने सुझाया गया रास्ता उसी 'स्मूथडिस्लोकेशन ऑफ वक्युब्लरि ऑफ नेटिव लैंग्विजेज' वाली सिध्दान्तिकी का अनुपालन है। क्योंकि, 'विश्व व्यापार संघ के द्वारा बार-बार भारत सरकार को कहा जाता रहा है कि 'रोल ऑफ गव्हर्मेण्ट आर्गेनाइजेशन्स शुड बी इन्क्रीज्ड इन प्रमोशन ऑव इंग्लिश'। इसी के अप्रकट निर्देश के चलते हमारे 'ज्ञान-आयोग' ने गहरे चिन्तन-मनन का नाटक कर के कहा कि 'देश के केवल एक प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी जानते हैं, अतः शेष को अंग्रेजी सिखाने के लिए पहली कक्षा से अंग्रेजी विषय की तरह शुरू कर दी जाये।' यह 'एजुकेशन फॉर ऑल' के नाम पर विश्व-बैंक द्वारा डॉलर में दिये गये ऋण का दबाव है, जो अपने निहितार्थ में 'इंग्लिश फॉर ऑल' का ही एजेण्डा है। अतः 'सर्वशिक्षा-अभियान' एक चमकीला राजनैतिक झूठ है। यह नया पैंतरा है, और जो 'भाषा की राजनीति' जानते हैं, वह बतायेंगे कि यह वही 'लिंग्विसिज्म' है, जिसके तहत भाषा को वर्चस्वी बनाया जाता है। दूसरा झूठ होता है, स्थानीय भाषा को 'फ्रेश-लिविंस्टिक लाइफ' देने के नाम पर उसे भीतर से बदल देना। पूरी बीसवीं शताब्दी में उन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप की तमाम भाषाओं को इसी तरह खत्म किया।
एक और दिलचस्प बात यह कि हम 'राजभाषा के अधिकारियों की भर्त्सना' में बहुत आनन्द लेते हैं, जबकि हकीकतन वह सरकारी केन्द्रीय कार्यालयों का सर्वाधिक लतियाया जाता रहने वाला नौकर होता है। कार्यालय प्रमुख की कुर्सी पर बैठा अधिकारी उसे सिर्फ हिन्दी पखवाड़े के समय पूछता है और जब 'संसदीय राजभाषा समिति' (जो दशकों से खानापूर्ति के लिए) आती-जाती है, के सामने बलि का बकरा बना दिया जाता है। यह परिपत्र भी उन्हीं के सिर पर ठीकरा फोड़ते हुए बता रहा है कि हिन्दी के शब्द कठिन, दुरूह और असंप्रेष्य हैं। जबकि, इतने वर्षों में कभी पारिभषिक-शब्दावलि का मानकीकरण' सरकार से खुद ही नहीं किया गया।
कहने की जरूरत नहीं कि यह इस तथाकथित 'भारत-सरकार' (जबकि, इनके अनुसार तो 'गव्हर्मेण्ट ऑफ इण्डिया' ही सरल शब्द है) का इस आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन है, जो देश के एक अरब बीस करोड़ लोगों को वह अंग्रेजी सिखाने का संकल्प लेती है, लेकिन 'साठ साल में मुश्किल से हिन्दी के हजार-डेढ़ हजार शब्द' नहीं सिखा पायी ? यह सरल-सरल का खेल खेलती हुई किसे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है ?
यह बहुत नग्न-सचाई है कि देश की मौजूदा सरकार ने 'उदारीकरण के उन्माद' में अपने 'कल्याणकारी राज्य' की गरदन कभी की मरोड़ चुकी है और 'कार्पोरेटी-संस्कृति' के सोच' को अपना अभीष्ट मानने वाले सत्ता के कर्णधारों को केवल 'घटती बढ़ती दर' के अलावा कुछ नहीं दिखता। 'भाषा' और 'भूगोल' दोनों ही उनकी चिंता के दायरे से बाहर हैं। निश्चय ही इस अभियान में हमारा समूचा मीडिया भी शामिल है, जिसने देश के सामने 'यूथ-कल्चर' का राष्ट्रव्यापी मिथ खड़ा किया और 'अंग्रेजी और पश्चिम के सांस्कृतिक उद्योग' में ही उन्हें अपना भविष्य बताने में जुट गया। यह मीडिया द्वारा अपनाई गई दृष्टि उसी 'रायल-चार्टर' की नीति का कार्यान्वयन है, जो कहता है, 'दे शुड नॉट रिजेक्ट अवर लैंग्विज एण्ड कल्चर इन फेवर आफ 'देअर' ट्रेडिशनल वेल्यूज। देअर स्ट्रांग एडहरेन्स टू मदर टंग हैज टू बी रप्चर्ड।'
कहना न होगा कि 'लैंग्विजेज शुड बी किल्ड विथ काइण्डनेस' की धूर्त रणनीति का प्रतिफल है, यह परिपत्र। बेशक इसे बकौल राहुल देव के 'हिन्दी के ताबूत में आखिरी कील' समझा जाना चाहिए। बहरहाल, हिन्दी को सरल और बोधगम्य बनाये जाने की सद्-इच्छा का मुखौटा धारण करने वाले इस चालाक नीति-निर्देश की चौतरफा आलोचना की जाना चाहिए और कहा जाना चाहिए कि इसे वे अविलम्ब वापस लें। निश्चय ही आप-हम-सब इस लांछन के साथ इस संसार से बिदा नहीं होना चाहेंगे कि 'प्रतिरोध' की सर्वाधिक चिंतनशील भाषा का, एक सांस्कृतिक रूप से अपढ़ सत्ता का कोई कारिन्दा हमारे सामने गला घोंटे और हम चुप बने रहे। यह घोषित रूप से जघन्य सांस्कृतिक अपराध है और हिन्दी के हत्यारों की फेहरिस्त में हमारा भी नाम रहेगा।
यह सरकार का हिन्दी को 'आमजन' की भाषा बनाने का पवित्र इरादा नहीं है, बल्कि खास लोगों की भाषा के जबड़े में उसकी गरदन फंसा देने की सुचिंतित युक्ति है। यह शल्यक्रिया के बहाने हत्या की हिकमत है। यह बिना लाठी टूटे साँप की तरह समझी जाने वाली भाषा को मारने की तरकीब है, क्योंकि यह अंग्रेजी के वर्चस्ववाद को डंसती है।
क्या कभी कोई कहता है कि अङ्ग्रेज़ी का फलाँ शब्द कठिन है ? 'परिचय-पत्र' के बजाय 'आइडियेण्टिटी कार्ड' कठिन शब्द है ? ऐसा कहते हुए वह डरता है। इस सोच से तो 'राष्ट्र' शब्द कठिन है और अंततः तो उनके लिये पूरी हिन्दी ही कठिन हैं । बस अन्त में यही कहना है कि अङ्ग्रेज़ी की दाढ़ में भारतीय-भाषाओं का खून लग चुका है। उसके मुँहह से खून की बू आ रही है और इस 'भाषाखोर' के सामने हमारी भाषाओं के गले में इसी तरह फंदा डाल कर धक्का दिया जा रहा है। यही वह समय है कि हम संभलें और हिंसा की इस कार्रवाई का पुरजोर विरोध करें।

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शिक्षा से ही नहीं, नौकरी से भी जाए अंग्रेजी

शिक्षा से ही नहीं, नौकरी से भी जाए अंग्रेजी
Dr.Kavita Vachaknavee



दैनिक भास्कर, 28 अप्रैल 2008 : प्रो. यशपाल यों तो हैं, वैज्ञानिक लेकिन बात उन्होंने ऐसी कह दी है, जो महात्मा गांधी और राममनोहर लोहिया ही कह सकते थे| आजकल वे एनसीईआरटी की राष्ट्रीय पाठ्रयक्रम समिति के अध्यक्ष हैं| इस समिति का काम देश भर की शिक्षा-संस्थाओं के लिए पाठ्रयक्रम बनाना है| ऐसी कई समितियॉं पहले भी बन चुकी हैं और कई नामी-गिरामी शिक्षाविद उनके अध्यक्ष और सदस्य रहे हैं लेकिन यह पहली बार है कि कोई अध्यक्ष जड़ तक पहुंचा है| पहली बार किसी अध्यक्ष ने कहा है कि बच्चों पर अंग्रेजी थोपी न जाए याने उन्हें वह पढ़ाई तो जाए लेकिन उसमें किसी को फेल न किया जाए|
क्यों कहा है, प्रो. यशपाल ने ऐसा? मुझे पता नहीं कि उनके तर्क क्या हैं लेकिन वे तर्क उनसे अलग क्या होंगे, जो हम बरसों से देते रहे हैं| सबसे पहला तर्क तो यही है कि सबसे ज्यादा बच्चे किसी विषय में फेल होते हैं तो वे अंग्रेजी में ही होते हैं| सरकारी संस्थाऍं इस ऑंकड़े को छिपाकर रखती हैं| 'भारतीय भाषा सम्मेलन' की ओर से अनेक पत्र् लिखने के बावजूद विश्व विद्यालय अनुदान आयोग और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पार्षद कभी यह नहीं बताते कि अंग्रेजी में फेल होेनेवाले छात्रें का प्रतिशत क्या है? हमारे सांसद और विधायक क्या कर रहे हैं? उन्हें यह सवाल पूछना चाहिए और अब यह सूचना के अधिकार के तहत अब पूछा ही जाएगा| सच्चाई यह है कि बी.ए. तक पहुंचते-पहुंचते 100 में से 96 बच्चे पढ़ाई से भाग खड़े होते हैं| ऐसा क्यों होता है? अन्य कारण तो हैं ही लेकिन सबसे गंभीर कारण अंग्रेजी की अनिवार्यता है| सारे विषयों की उपेक्षा करके सबसे ज्यादा ध्यान अंग्रेजी पर लगाना पड़ता है और परीक्षा के दिनों में उसी की दहशत दिल में बैठी रहती है| परीक्षा सजा की तरह मालूम पड़ती है और जब परिणाम आते हैं तो अंग्रेजी के कारण ही सबसे ज्यादा शर्मिंदगी उठानी पड़ती है| अन्य विषयों में कोई छात्र् कितना ही प्रवीण हो, अंग्रेजी के कारण वह अयोग्य घोषित हो जाता है या उसका दर्जा घट जाता है| अंग्रेजी योग्यता का पर्याय बन जाती है|
प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में तो अंग्रेजी क़हर ढाती है| यूरोप के कुछ देशों ने भारत की नकल करके अपने बच्चों पर अनिवार्य अंग्रेजी थोपने की कोशिश की| नतीजा यह हुआ कि उन्हें तरह-तरह की बीमारियॉं होने लगी| उनकी भूख मर गई, याददाश्त घट गई, नींद गड़बड़ा गई, सिरदर्द रहने लगा, जुबान हकलाने लगी| विदेशी भाषा वे बच्चे तो सीख ही नहीं पाते, जिनके माता-पिता उसे नहीं जानते| भारत के मुश्किल से 5-6 प्रतिशत माता-पिता थोड़ी-बहुत अंग्रेजी जानते हैं| इसका अर्थ यह हुआ कि गरीबों, ग्रामीणों, पिछड़ों, अनुसूचितों और तथाकथित अल्पसंख्यकों के बच्चों को तो फेल होना ही है| शिक्षा के नाम पर अपने दिमाग में हीनता-ग्रंथि पालना ही है और मौका मिलते ही स्कूली शिक्षा से पिंड छुड़ाना ही है| ऐसे में सर्व शिक्षा अभियान क्या कोरा मज़ाक बनकर नहीं रह जाएगा?
प्रो. यशपाल के अलावा आज तक किसी शिक्षा मंत्री को यह बात क्यों नहीं सूझी कि अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई बच्चों के लिए जानलेवा है| क्या हम भूल गए कि पिछले साल इंजीनियरिंग के छात्र् ब्रजेश जायसवाल और इलाहाबाद के बैंक कर्मचारी रामबाबू ने अंग्रेजी के कारण ही आत्महत्या की थी| अभी-अभी दिल्ली के एक अन्य छात्र् ने भी मरने के पहले यही कारण बताया था| उसके पिता अंग्रेजी माध्यम के स्कूल की फीस नहीं भर सकते थे| हमारे कई मुख्यमंत्री और शिक्षा-मंत्री बाल शिक्षा के साथ बड़ी दुश्मनी कर रहे हैं| वे पहली कक्षा से ही अंग्रेजी को अनिवार्य बना रहे हैं| वे सोचते हैं कि अगर अंग्रेजी से ही नौकरी मिलनी है और सामाजिक हैसियत बननी है तो फिर उसे पॉंचवीं से क्यों, पहली कक्षा से ही क्यों न पढ़ाया जाए? उनका इरादा नेक है लेकिन उनकी कारगुजारी बाल-हत्या से कम नहीं है| आज तक दुनिया के किसी मूर्खतम तानाशाह ने जो काम नहीं किया, वे हमारे मुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री कर रहे हैं| अंग्रेजी में किसी को फेल न किया जाए, यह बड़ी नरम मांग है| ज्यादा जरूरी है कि अंग्रेजी की पढ़ाई को एच्छिक बनाया जाए| जिसे अंग्रेजी पढ़ना हो, वह कॉलेज में पढ़े और जमकर पढ़े | साल-दो साल में इतनी अच्छी पढ़ ले कि वह अंग्रेजों को अंग्रेजी सिखाए| हमारी विद्यार्थी अंग्रेजी या किसी भी विदेशी भाषा के गुलाम बनने की बजाय उसके स्वामी बनें| विदेशी भाषा को अपने लाभ का साधन बनाएं न कि उसके गुलाम बन जाएं|
इतना काफी नहीं है कि अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई खत्म हो| यह भी जरूरी है कि अंग्रेजी माध्यम से कोई भी विषय नहीं पढ़ाया जाए| यदि सारे विषय–ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, काम-धंधे आदि अपनी भाषाओं में पढ़ाए जाऍं तो बच्चे उन्हें जल्दी सीखेंगे और बेहतर सीखेंगे| साठ साल तक हमारी शिक्षा में उल्टी खोपड़ी चलती रही| हमने वह मूर्खता की जो दुनिया के किसी भी देश ने नहीं की| यदि हम स्वभाषा का माध्यम बनाते तो अब तक हम चीन और रूस से आगे निकल जाते| क्या अमेरिका, बि्रटेन, फ्रांस, जर्मनी और जापान ने अपने बच्चों को विदेशी माध्यम से पढ़ाया है? अंग्रेजी ने हमारी शिक्षा की गुणवत्ता को तो घटाया ही, उसका विस्तार भी रोका| अंग्रेजी ने देश में अशिक्षा फैलाई| आज भी 70-80 प्रतिशत भारतीय अशिक्षित हैं| 70 प्रतिशत लोग साक्षर हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि वे शिक्षित हैं| जो सिर्फ अपना दस्तखत कर सके, क्या उसे हम शिक्षित कहेंगे? यदि शत-प्रतिशत भारतीय शिक्षित होते तो भारत कभी का महाशक्ति बन गया होता| बेरोजगारी खत्म हो गई होती| आरक्षण अनावश्यक हो जाता| समतामूलक समाज बनता|
लेकिन ऐसा होना आसान नहीं है, क्योंकि हमारे सवर्ण, शहरी और मुट्ठीभर अंग्रेजीदॉं नेताओं ने अंग्रेजी का जबर्दस्त तिलिस्म खड़ा कर दिया है| उसे नौकरियों से जोड़ दिया है| यह सिर्फ भारत में ही होता है| किसी भी देश में किसी को नौकरी से इसलिए वंचित नहीं किया जाता कि उसे विदेशी भाषा नहीं आती| अंग्रेजी जाने बिना आप भारत में केवल चपरासी या चौकीदार की नौकरी ही पा सकते हैं| इसीलिए गरीब लोगों को अपना पेट काटकर अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाना पड़ता है| यदि नौकरियों से अंग्रेजी हटा लें तो यह तिलिस्म धड़ाम से जमीन पर आ गिरेगा| कौन बेवकूफ है, जो हिरण पर घास लादेगा? सारे पब्लिक स्कूल साल भर में ही बंद हो जाऍंगे| भारत और इंडिया का भेद पैदा करनेवाली जड़ कट जाएगी| इसीलिए अंग्रेजी सिर्फ शिक्षा में ही नहीं, नौकरी में भी एच्छिक होनी चाहिए| आइए प्रो. यशपालजी, थोड़ा और आगे बढि़ए| हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलिए|

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गो-मूत्र से घड़ी चलाई


पुजारी ने गो-मूत्र से घड़ी चलाई


रोहतक : कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों के खिलाफ गोमूत्र रामबाण सिद्ध हो चुका है, लेकिन अब इसका एक और चमत्कारिक गुण सामने आया है। रोहतक के एक पुजारी ने गोमूत्र की मदद से रुकी पड़ी घड़ी को चला दिया है।
शहर की शिवाजी कॉलोनी स्थित शिव मंदिर के पुजारी पंडित संदीप पाठक ने करीब दो साल की मेहनत के बाद यह सफलता हासिल की है। उन्होंने करीब डेढ़ लीटर गोमूत्र एकत्रित किया। उन्हें तीन अलग-अलग जग में रखा। इसके बाद उसमें जिंक व कॉपर प्लेट की मदद से सर्किट तैयार किया। इससे करीब 1.5 वाट की एनर्जी पैदा हुई, जिससे घड़ी चलने लगी। जिंक व कॉपर गोमूत्र में से इलेक्ट्रॉड निकाल लेता है।
उनके अनुसार डेढ़ लीटर गो मूत्र से करीब 40 दिन तक घड़ी चलाई जा सकती है। वैसे एक बैटरी से घड़ी आमतौर पर करीब नौ से 12 माह तक चलती है। पंडित संदीप बताते हैं कि घड़ी चलाने के बाद अगला लक्ष्य ट्रांजिस्टर चलाना है। अगर ट्रांजिस्टर में सफलता मिली तो वे बल्ब जलाने के लिए प्रयोग करेंगे। उनका मकसद लोगों को गोमूत्र की शक्ति से रूबरू कराना है। आज लोग गो माता को भूलते जा रहे हैं।
मां तीन साल तक दूध पिलाकर अपने बच्चों को बड़ा करती है, लेकिन गोमाता ताउम्र दूध पिलाती है। भैंस का कटड़ा जन्म लेता है तो वह सुस्त रहता है। जब गाय बछड़े को जन्म देती है तो वह कुछ क्षण बाद ही खड़ा हो जाता है। इससे पता चलता है कि गो माता कितनी शक्तिशाली है।पंडित संदीप बताते हैं कि पिछले साल गोपाष्टमी पर इसका प्रयोग किया था, लेकिन तब सफलता नहीं मिल पाई थी। अब तीन अक्टूबर को गोपाष्टमी पर्व था, जो कि भगवान कृष्ण से जुड़ा है।
इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने बछड़ों की जगह गोमाता को चराना शुरू किया था। यह दिन काफी पवित्र है, इसलिए मेरा लक्ष्य था कि गोपाष्टमी के दिन गोमूत्र से नया आविष्कार किया जाए। पिछले करीब दो साल की मेहनत अब रंग लाई है।
एमडीयू के बायोकेमेस्ट्री डिपार्टमेंट की प्राध्यापिका डॉ. रितु पसरीजा के अनुसार वैसे हर लिक्विड में सॉल्यूशन होता है, लेकिन इस शोध में गोमूत्र से जो घड़ी चलाई है, उसमें बिजली की क्षमता, स्टोर करने और कितनी देर तक काम करने जैसे सवालों की गहराई में जाना पड़ेगा। जहां तक गो माता के दूध व गोमूत्र की बात है, वह कई मामलों में सिद्ध हो चुकी है।

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अंगेजी कानूनों के २ जबरदस्त पहलू




अंगेजी कानूनों के २ जबरदस्त पहलू जो आज भी बहुत कारगर हैं जनता को चुप करने के लिए, ये फंडे अंग्रेजो ने आयरलैंड में अजमा लिया था .
भारत के लगभग सभी कानून हुबहू वाही हैं जो अंग्रेजो ने सबसे पहले आयरलैंड को गुलाम बनाने के लिए बनाये थे और उनका बहुत तगड़ा परिणाम मिला था. अंग्रेजी कानून के दो मुख्या सिद्धांत हुआ करते थे:
१)कानून को इस तरह बनाया जाये की जनता आम  जीवन में रोज इसका उल्लंघन करने के लिए बाध्य हो जाये.
२)कानून का बार बार उल्लंघन करके जनता में इतना अपराध बोध हो जाये की वह हुकूमत करने वालो के बड़े से बड़े अपराध की तरफ भी उंगली न उठा पाए.
आयरलैंड में आजमाए गए इस व्यवस्था की वजह से अंग्रेजो उन्ही कानूनों को बिना  किसी परिवर्तन के भारत में पूरी तरह लागू कर दिया था और वे भारत को इन्ही कानूनों के बल पर बड़े मजे से २५० सालो तक बेख़ौफ़ होकर राज किया. उन्होंने हर जरुरी काम के लिए परमिट और लाइसेंस का प्राविधान कर रखा था जिससे जब चाहे जनता को फंसाया जा सके.
सबसे मजे की बात है की इन्ही कानूनों को भारत में स्वतंत्रता के बाद  भी बिना किसी फेर बदल के नेहरू ने "ट्रांसफर ऑफ पॉवर अग्रीमेंट" के तहत लागू कर दिया जो आज भी चल रहे है. भारत के वर्तमान कानून में ऐसे ऐसे प्राविधान की हम लोग उनका उल्लंघन करते हुए अपराधबोध से ग्रस्त हो चुके है और इसे वजह से नेताओ के बड़े से बड़े अपराध पर भी उंगली नहीं उठा पाते है. अंगेजो ने भारतीयों को छोटे से छोटे अपराध के लिए जेलों  में डाला और स्वयं बड़े अपराध करके बचते रहे. आज भी वाही हो रहा है. अंग्रेजो  ने हर अपराध की एक ही सजा बना रखी थे जिसमे सबसे पहले जनता ही उल्लंघन करके फंस जाती  थी. इसमे अंग्रेजो ने काफी दिमाग खर्च किया था. जैसे चोरी छोटी या बड़ी, सब बराबर है.... और जनता उसे भुगत रही है.
हमें सबसे पहले अपराध का  श्रेणीकरण करके उसका दंड निर्धारित करना होगा. १००० रुपये और अरबो रुपये के भ्रष्टाचार में अंतर करके दंड बनाना होगा अदि....

संजय कुमार मौर्य,

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सोनिया गाँधी अपना मुहं लेकर वापस अपने घर चली गयी .........

सोनिया गाँधी को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री मेजर जनरल [रिटायर्ड] बी सी खंडूरी का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को लिखे एक पत्र से बुखार आ गया ..

सोनिया गाँधी को उतराखण्ड मे ऋषिकेश से कर्ण प्रयाग तक बनी रेल लाइन का उद्घाटन करना था .. सभी बड़े बड़े अखबारों मे कांग्रेस ने इसके लिए विघ्यापन दिए थे .. और सुबह सोनिया गाँधी अपने घर से एअरपोर्ट के तरफ निकल भी चूँकि थी .. लेकिन तभी प्रधानमंत्री ने उन्हें वापस बुला लिया ..

हुआ ये कि खंडूरी ने फेक्स भेजकर और फोन कर राष्ट्रपति और प्रधनमंत्री से ये पूछा कि आखिर रेल परियोजना का उद्घाटन सोनिया गाँधी किस हैसियत से करेंगी ? उन्होंने प्रोटोकाल का हवाला देकर पूछा कि सोनिया गाँधी संविधान से अनुसार सिर्फ एक सांसद है फिर ये प्रोटोकॉल के अनुसार जब किसी भी समारोह मे रेल मंत्री और दूसरे अन्य कई केबिनेट मंत्री मौजूद हों तो उन्हें उद्घाटन करने को कोई हक नहीं है ..

फिर उन्होंने नीचे लिखा कि सोनिया गाँधी को उत्तराखड सरकार किसी भी हाल मे उद्घटन करने नहीं देगी ..चाहे इसके लिए पुलिस करवाई ही क्यों ना करनी पड़े .. क्योकि उतराखंड की सरकार भारत मे संविधान का मजाक बनते नहीं देख सकती ..

फिर क्या था !!! सोनिया गाँधी अपना मुहं लेकर वापस अपने घर चली गयी .. और कांग्रेस ने बोला कि सोनिया गाँधी को बुखार आ गया है .. ..........

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दो दिवसीय राष्ट्रिय संगोष्ठी /9-10 december 2011/kalyan/maharashtra


राष्ट्रिय संगोष्ठी में आनेवाले प्रतिभागियों से विनम्र अनुरोध

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      दिनांक ०९ -१० दिसम्बर २०११ को के.एम्.अग्रवाल महाविद्यालय ,कल्याण (पश्चिम ) में " हिंदी ब्लागिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनाएं " इस  विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रिय संगोष्ठी में आने के इच्छुक प्रतिभागियों से अनुरोध है कि वे निम्नलिखित बातों का ख़याल रखें .
    १-  प्रतिभागियों को किसी तरह का यात्रा व्यय महाविद्यालय क़ी तरफ से नहीं मिलेगा . 
   २-आवास और भोजन क़ी व्यवस्था सिर्फ दो दिनों के लिए ही क़ी  गयी है, ०९ और १० दिसम्बर २०११ . इन दो दिनों के अतिरिक्त आवास और भोजन क़ी व्यवस्था प्रतिभागी क़ी अपनी जिम्मेदारी होगी .
 ३- कोई प्रतिभागी यदि अपने परिवार के साथ आना  चाहता है तो वे अपनी व्यक्तिगत व्यवस्था के साथ ही आयें. महाविद्यालय क़ी तरफ से अलग  से कोई व्यवस्था नहीं क़ी जायेगी .
४- पंजीकरण शुल्क ४०० रुपए सभी प्रतिभागियों को देने होंगे .
५- आवास क़ी सुविधा के लिए हर प्रतिभागी को ५०० रुपए देने होंगे .
 ६- आवास क़ी व्यवस्था बालाजी इंटर नेशनल  होटल में क़ी गयी है. एक  कमरे में  ०३ प्रतिभागियों . के रुकने क़ी व्यवस्था है . 
 ७- एक व्यक्ति -एक कमरा --- जैसी व्यवस्था नहीं है 
८- आवास क़ी व्यवस्था पूर्व  सूचना    देने वाले  प्रतिभागियों के लिए ही क़ी गयी है 
9- प्रपत्र  वाचन  के लिए किसी प्रकार  के मानधन  क़ी व्यवस्था नहीं है. इसकी  अपेक्षा  भी  ना  करें  .
१०- कार्यक्रम  से सम्बंधित  किसी भी  प्रकार  के निर्णय  को लेने  के लिए महाविद्यालय स्वतन्त्र  है .
           आशा  है आप सभी का सहयोग  हमे  मिलेगा .  किसी  बात को अन्यथा ना लें . बात साफ़-सुथरे तरीके से कह देना जादा बेहतर है .

आपका 
 डॉ. मनीष कुमार मिश्रा 

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बाजार और मीडिया के बीच भारतीय भाषाएं

शनिवार, 26 मई 2012

बाजार और मीडिया के बीच भारतीय भाषाएं



हिंदी और भारतीय भाषाओं को लेकर समाज में एक अजीब सा सन्नाटा है। संचार व
मीडिया की भाषा पर कोई बात नहीं करना चाहता। उसके जायज-नाजायज इस्तेमाल और भाषा
में दूसरी भाषाओं खासकर अंग्रेजी की मिलावट को लेकर भी कोई प्रतिरोध नजर नहीं आ
रहा है। ठेठ हिंदी का ठाठ जैसे अंग्रेजी के आतंक के सामने सहमा पड़ा है और
हिंदी और भारतीय भाषाओं के समर्थक एक अजीब निराशा से भर उठे हैं। ऐसे में
मीडिया की दुनिया में इन दिनों भाषा का सवाल काफी गहरा हो जाता है। मीडिया में
जैसी भाषा का इस्तेमाल हो रहा है उसे लेकर शुध्दता के आग्रही लोगों में काफी
हाहाकार व्याप्त है। चिंता हिंदी की है और उस हिंदी की जिसका हमारा समाज उपयोग
करता है। बार-बार ये बात कही जा रही है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में
अंग्रेजी की मिलावट से हमारी भाषाएं अपना रूप-रंग-रस और गंध खो रही है।

बाजार की सबसे प्रिय भाषाः

हिंदी हमारी भाषा के नाते ही नहीं,अपनी उपयोगिता के नाते भी आज बाजार की सबसे
प्रिय भाषा है। आप लाख अंग्रेजी के आतंक का विलाप करें। काम तो आपको हिंदी में
ही करना है, ये मरजी आपकी कि आप अपनी स्क्रिप्ट देवनागरी में लिखें या रोमन
में। यह हिंदी की ही ताकत है कि वह सोनिया गांधी से लेकर कैटरीना कैफ सबसे
हिंदी बुलवा ही लेती है। उड़िया न जानने के आरोप झेलनेवाले नेता नवीन पटनायक भी
हिंदी में बोलकर ही अपनी अंग्रेजी न जानने वाली जनता को संबोधित करते हैं। इतना
ही नहीं प्रणव मुखर्जी की सुन लीजिए वे कहते हैं कि वे प्रधानमंत्री नहीं बन
सकते क्योंकि उन्हें ठीक से हिंदी बोलनी नहीं आती। कुल मिलाकर हिंदी आज मीडिया,
राजनीति,मनोरंजन और विज्ञापन की प्रमुख भाषा है। हिंदुस्तान जैसे देश को एक
भाषा से सहारे संबोधित करना हो तो वह सिर्फ हिंदी ही है। यह हिंदी का अहंकार
नहीं उसकी सहजता और ताकत है। मीडिया में जिस तरह की हिंदी का उपयोग हो रहा है
उसे लेकर चिंताएं बहुत जायज हैं किंतु विस्तार के दौर में ऐसी लापरवाहियां हर
जगह देखी जाती हैं। कुछ अखबार प्रयास पूर्वक अपनी श्रेष्टता दिखाने अथवा युवा
पाठकों का ख्याल रखने के नाम पर हिंग्लिश परोस रहे हैं जिसकी कई स्तरों पर
आलोचना भी हो रही है। हिंग्लिश का उपयोग चलन में आने से एक नई किस्म की भाषा का
विस्तार हो रहा है। किंतु आप देखें तो वह विषयगत ही ज्यादा है। लाइफ स्टाइल,
फिल्म के पन्नों, सिटी कवरेज में भी लाइट खबरों पर ही इस तरह की भाषा का प्रभाव
दिखता है। चिंता हिंदी समाज के स्वभाव पर भी होनी चाहिए कि वह अपनी भाषा के
प्रति बहुत सम्मान भाव नहीं रखता, उसके साथ हो रहे खिलवाड़ पर उसे बहुत आपत्ति
नहीं है। हिंदी को लेकर किसी तरह का भावनात्मक आधार भी नहीं बनता, न वह अपना
कोई ऐसा वृत्त बनाती है जिससे उसकी अपील बने।

समर्थ बोलियों का संसारः

हिंदी की बोलियां इस मामले में ज्यादा समर्थ हैं क्योंकि उन्हें क्षेत्रीय
अस्मिता एक आधार प्रदान करती है। हिंदी की सही मायने में अपनी कोई जमीन नहीं
है। जिस तरह भोजपुरी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, बुंदेली, बधेली, गढ़वाली,
मैथिली,बृजभाषा जैसी तमाम बोलियों ने बनाई है। हिंदी अपने व्यापक विस्तार के
बावजूद किसी तरह का भावनात्मक आधार नहीं बनाती। सो इसके साथ किसी भी तरह की
छेड़छाड़ किसी का दिल भी नहीं दुखाती। मीडिया और मनोरंजन की पूरी दुनिया हिंदी
के इसी विस्तारवाद का फायदा उठा रही है किंतु जब हिंदी को देने की बारी आती है
तो ये भी उससे दोयम दर्जे का ही व्यवहार करते हैं। यह समझना बहुत मुश्किल है कि
विज्ञापन, मनोरंजन या मीडिया की दुनिया में हिंदी की कमाई खाने वाले अपनी
स्क्रिप्ट इंग्लिश में क्यों लिखते हैं। देवनागरी में किसी स्क्रिप्ट को लिखने
से क्या प्रस्तोता के प्रभाव में कमी आ जाएगी, फिल्म फ्लाप हो जाएगी या मीडिया
समूहों द्वारा अपने दैनिक कामों में हिंदी के उपयोग से उनके दर्शक या पाठक भाग
जाएंगें। यह क्यों जरूरी है कि हिंदी के अखबारों में अंग्रेजी के स्वनामधन्य
लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकारों के तो लेख अनुवाद कर छापे जाएं उन्हें मोटा
पारिश्रमिक भी दिया जाए किंतु हिंदी में मूल काम करने वाले पत्रकारों को मौका
ही न दिया जाए। हिंदी के अखबार क्या वैचारिक रूप से इतने दरिद्र हैं कि उनके
अखबारों में गंभीरता तभी आएगी जब कुछ स्वनामधन्य अंग्रेजी पत्रकार उसमें अपना
योगदान दें। यह उदारता क्यों। क्या अंग्रेजी के अखबार भी इतनी ही सदाशयता से
हिंदी के पत्रकारों के लेख छापते हैं।

रोमन में हो रहा है कामः

पूरा विज्ञापन बाजार हिंदी क्षेत्र को ही दृष्टि में रखकर विज्ञापन अभियानों को
प्रारंभ करता है किंतु उसकी पूरी कार्यवाही देवनागरी के बजाए रोमन में होती है।
जबकि अंत में फायनल प्रोडक्ट देवनागरी में ही तैयार होना है। गुलामी के ये भूत
हमारे मीडिया को लंबे समय से सता रहे हैं। इसके चलते एक चिंता चौतरफा व्याप्त
है। यह खतरा एक संकेत है कि क्या कहीं देवनागरी के बजाए रोमन में ही तो हिंदी न
लिखने लगी जाए। कई बड़े अखबार भाषा की इस भ्रष्टता को अपना आर्दश बना रहे हैं।
जिसके चलते हिंदी सरमायी और सकुचाई हुई सी दिखती है। शीर्षकों में कई बार पूरा
का शब्द अंग्रेजी और रोमन में ही लिख दिया जा रहा है। जैसे- मल्लिका का BOLD
STAP या इसी तरह कौन बनेगा PM जैसे शीर्षक लगाकर आप क्या करना चाहते हैं। कई
अखबार अपने हिंदी अखबार में कुछ पन्ने अंग्रेजी के भी चिपका दे रहे हैं। आप ये
तो तय कर लें यह अखबार हिंदी का है या अंग्रेजी का। रजिस्ट्रार आफ न्यूजपेपर्स
में जब आप अपने अखबार का पंजीयन कराते हैं तो नाम के साथ घोषणापत्र में यह भी
बताते हैं कि यह अखबार किस भाषा में निकलेगा क्या ये अंग्रेजी के पन्ने जोड़ने
वाले अखबारों ने द्विभाषी होने का पंजीयन कराया है। आप देखें तो पंजीयन हिंदी
के अखबार का है और उसमें दो या चार पेज अंग्रेजी के लगे हैं। हिंदी के साथ ही
आप ऐसा कर सकते हैं। संभव हो तो आप हिंग्लिश में भी एक अखबार निकालने का प्रयोग
कर लें। संभव है वह प्रयोग सफल भी हो जाए किंतु इससे भाषायी अराजकता तो नहीं
मचेगी।

हिंदी के खिलाफ मनमानीः

हिंदी में जिस तरह की शब्द सार्मथ्य और ज्ञान-विज्ञान के हर अनुशासन पर अपनी
बात कहने की ताकत है उसे समझे बिना इस तरह की मनमानी के मायने क्या हैं। मीडिया
की बढ़ी ताकत ने उसे एक जिम्मेदारी भी दी है। सही भाषा के इस्तेमाल से नई पीढ़ी
को भाषा के संस्कार मिलेंगें। बाजार में हर भाषा के अखबार मौजूद हैं, मुझे
अंग्रेजी पढ़नी है तो मैं अंग्रेजी के अखबार ले लूंगा, वह अखबार नहीं लूंगा
जिसमें दस हिंदी के और चार पन्ने अंग्रेजी के भी लगे हैं। इसी तरह मैं अखबार के
साथ एक रिश्ता बना पाता हूं क्योंकि वह मेरी भाषा का अखबार है। अगर उसमें भाषा
के साथ खिलवाड़ हो रहा है तो क्या जरूरी है मैं आपके इस खिलवाड़ का हिस्सा
बनूं। यह दर्द हर संवेदनशील हिंदी प्रेमी का है। हिंदी किसी जातीय अस्मिता की
भाषा भले न हो यह इस महादेश को संबोधित करनेवाली सबसे समर्थ भाषा है। इस सच्चाई
को जानकर ही देश का मीडिया, बाजार और उसके उपादान अपने लक्ष्य पा सकते हैं।
क्योंकि हिंदी की ताकत को कमतर आंककर आप ऐसे सच से मुंह चुरा रहे हैं जो सबको
पता है। हजारों-हजार गीत, कविताएं, साहित्य, शिल्प और तमाम कलाएं नष्ट होने के
कगार पर हैं। किंतु उनके गुणग्राहक कहां हैं। एक विशाल भू-भाग में बोली जाने
वाली हजारों बोलियां, उनका साहित्य-जो वाचिक भी है और लिखित भी। उसकी कलाचेतना,
प्रदर्शन कलाएं सारा कुछ मिलकर एक ऐसा लोक रचती है जिस तक पहुंचने के लिए अभी
काफी समय लगेगा। लोकचेतना तो वेदों से भी पुरानी है। क्योंकि हमारी परंपरा में
ही ज्ञान बसा हुआ है। ज्ञान, नीति-नियम, औषधियां, गीत, कथाएं, पहेलियां सब कुछ
इसी 'लोक' का हिस्सा हैं। हिंदी अकेली भाषा है जिसका चिकित्सक भी 'कविराय' कहा
जाता था। बाजार आज सारे मूल्य तय कर रहा है और यह 'लोक' को नष्ट करने का
षडयंत्र है। यह सही मायने में बिखरी और कमजोर आवाजों को दबाने का षडयंत्र भी
है। इसका सबसे बड़ा शिकार हमारी बोलियां बन रही हैं, जिनकी मौत का खतरा मंडरा
रहा है। अंडमान की 'बो' नाम की भाषा खत्म होने के साथ इसका सिलसिला शुरू हो गया
है। भारतीय भाषाओं और बोलियों के सामने यह सबसे खतरनाक समय है। आज के मुख्यधारा
के मीडिया के पास इस संदर्भों पर काम करने का अवकाश नहीं है। किंतु समाज के
प्रतिबद्ध पत्रकारों, साहित्यकारों को आगे आकर इस चुनौती को स्वीकार करने की
जरूरत है क्योंकि 'लोक' की उपेक्षा और बोलियों को नष्ट कर हम अपनी प्रदर्शन
कलाओं, गीतों, शिल्पों और विरासतों को गंवा रहे हैं। जबकि इसके संरक्षण की
जरूरत है।

बढ़ती ताकत के बावजूद उपेक्षाः

भारतीय भाषाओं के प्रकाशन आज अपनी प्रसार संख्या और लोकप्रियता के मामले में
अंग्रेजी पर भारी है, बावजूद इसके उसका सम्मान बहाल नहीं हो रहा है। इंडियन
रीडरशिप सर्वे की रिपोर्ट देंखें तो सन् 2011 के आंकडों में देश के दस सर्वाधिक
पढ़े जाने वाले अखबारों में अंग्रेजी का एक मात्र अखबार है वह भी छठें स्थान
पर। जिसमें पहले तीन स्थान हिंदी अखबारों के लिए सुरक्षित हैं। यानि कुल पहले
10 अखबारों में 9 अखबार भारतीय भाषाओं के हैं। आईआरएस जो एक विश्वसनीय पाठक
सर्वेक्षण है के मुताबिक अखबारों की पठनीयता का क्रम इस प्रकार है-

1.दैनिक जागरण (हिंदी)

2. दैनिक भास्कर (हिंदी)

3.हिंदुस्तान (हिंदी)

4. मलयालम मनोरमा( मलयालम)

5.अमर उजाला (हिंदी)

6.द टाइम्स आफ इंडिया (अंग्रेजी)

7.लोकमत (मराठी)

8.डेली थांती (तमिल)

9.राजस्थान पत्रिका (हिंदी)

10. मातृभूमि (मलयालम)

देश की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली पत्रिकाओं में भी पहले 10 स्थान पर अंग्रेजी के
मात्र दो प्रकाशन शामिल हैं। इंडियन रीडरशिप सर्वे के 2011 के आंकड़े देखें तो
देश में सर्वाधिक प्रसार संख्या वाली पत्रिका वनिता (मलयालम) है। दूसरा स्थान
हिंदी के प्रकाशन प्रतियोगिता दर्पण को प्राप्त है। देश में सर्वाधिक पढ़ी जाने
वाली पत्रिकाओं का क्रम इस प्रकार हैः

वनिता (मलयालम)-पाक्षिक

प्रतियोगिता दर्पण (हिंदी)-मासिक

सरस सलिल( हिंदी)-पाक्षिक

सामान्य ज्ञान दर्पण (हिंदी)-मासिक

इंडिया टुडे (अंग्रेजी)-साप्ताहिक

मेरी सहेली (हिंदी)-मासिक

मलयालया मनोरमा (मलयालम)-साप्ताहिक

क्रिकेट सम्राट (हिंदी)-मासिक

जनरल नालेज टुडे (अंग्रेजी)-मासिक

कर्मक्षेत्र (बंगला)-साप्ताहिक ( स्रोतः आईआरएस-2011 क्यू फोर)

भाषा के अपमान का सिलसिलाः

इस संकट के बरक्स हम भाषा के अपमान का सिलसिला अपनी शिक्षा में भी देख सकते
हैं। हालात यह हैं कि मातृभाषाओं में शिक्षा देने के सारे जतन आज विफल हो चुके
हैं। जो पीढ़ी आ रही है उसके पास हिंग्लिस ही है। वह किसी भाषा के साथ अच्छा
व्यवहार करना नहीं जानती है। शिक्षा खासकर प्राथमिक शिक्षा में भाषाओं की
उपेक्षा ने सारा कुछ गड़बड़ किया है। इसके चलते हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर चुके
हैं जिनमें भारतीय भाषाओं और हिंदी के लिए आदर नहीं है। इसलिए पापुलर का पाठ
गाता मीडिया भी ऐसी मिश्रित भाषा के पीछे भागता है। साहित्य के साथ पत्रकारिता
की बढ़ी दूरी और भाषा के साथ अलगाव ने मीडिया को एक नई तरह की भाषा और पदावली
दी है। जिसमें वह संवाद तो कर रहा है किंतु उसे आत्मीय संवाद में नहीं बदल पा
रहा है। जिस भाषा के मीडिया का साहित्य से एक खास रिश्ता रहा हो, उसकी
पत्रकारिता ने ही हिंदी को तमाम शब्द दिए हों और भाषा के विकास में एक खास
भूमिका निभायी हो, उसकी बेबसी चिंता में डालती है। भाषा, साहित्य और मीडिया के
इस खास रिश्ते की बहाली जरूरी है। क्योंकि मीडिया का असर उसकी व्यापकता को
देखते हुए साहित्य की तुलना में बहुत बड़ा है। किंतु साहित्य और भाषा के आधार
अपने मीडिया की रचना खड़ी करना जरूरी है,क्योंकि इनके बीच में अंतरसंवाद से
मीडिया का ही लाभ है। वह समाज को वे तमाम अनुभव भी दे पाएगा जो मीडिया की
तुरंतवादी शैली में संभव नहीं हो पाते। पापुलर को साधते हुए मीडिया को उसे भी
साधना होगा जो जरूरी है। मीडिया का एक बड़ा काम रूचियों का परिष्कार भी है। वह
तभी संभव है जब वह साहित्य और भाषा से प्रेरणाएं ग्रहण करता रहे। भाषा की सहजता
से आगे उसे भाषा के लोकव्यापीकरण और उसके प्रति सम्मान का भाव भी जगाना है तभी
वह सही मायने में 'भारत का मीडिया' बन पाएगा।

प्रस्तुतिः संजय द्विवेदी

· लेखक परिचय

संजय द्विवेदी



लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के
अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग,माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय
पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल
(मप्र)मोबाइलः 098935-98888



From: bipin kumar sinha

किसी भाषा की शिक्षा सर्वप्रथम घर और परिवार से आरंभ होती है जैसे अन्य संस्कार
घर से शुरू होते है .घर प्रार्थमिक पाठशाला है इसलिए इस समस्या के जड़ की तलाश
वहीँ करनी चाहिए .घर के बुजुर्ग ही इस पर ध्यान दे कि बच्चा जो भाषा बोल रहा है
वह शुद्ध है या नहीं .इसके लिए उसे भी अपनी भाषा का परिमार्जन करते रहना होगा
.यदि हम अंग्रेजी बोल रहे है तो उसे भी सही बोलना चाहिए ताकि बच्चे उसे भी ठीक
से बोल सके .पर जब हम ही भाषा का प्रयोग सही ढंग से न कर रहे हों तो दुसरे को
दोष देना उचित नहीं है.रही संचार माध्यमो द्वारा भाषाओँ के दुरूपयोग का तो उस
तरफ अधिक ध्यान देने कि आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसकी स्थिति एक मदारी या तेल
बेचने वाले सेअधिक नहीं है.क्यों कि भाषा को तोडना और मरोरना इनके व्यवसाय से
जुडा रहता है .इनसे भाषा की शुद्धता अपेच्छा करना ही गलत है यह हमें ध्यान देना
है कि इससे हमारी भाषा में विकृति न आ जाये किसी भी प्रकार के प्रदुषण के लिए
हम स्वयं को सुरक्षित करने का प्रयत्न करते है तो उसी प्रकार भाषा के प्रदुषण
के लिए सुर क्षात्मक उपाय करने चाहिए जो भी बन पड़े वह कदम उठाना चाहिए .मैंने
पढ़ा है कि देवकीनंदन खत्री की चन्द्रकांता पढने के लिए बहुतो ने हिंदी भाषा
सीखी उसी प्रकार हम आज भी ऐसा कर सकते है की शुद्ध हिंदी सीखने के लिए लोग विवश
हो जाये.मैंने देखा है की लोग लिखने और बोलने में लिंग बोध और कारक चिन्हों का
गलत प्रयोग करते है पर इसका जरा भी उन्हें दुःख नहीं होता है और न ही अपमान बोध
का .जन्म देने वाली माँ के बाद भाषा को ही दूसरी माँ समझना चाहिए.पर इसका यह
आशय नहीं है कि दूसरी भाषा नहीं सीखनी चाहिए पर कोई अपनी माँ का अनादर कर दूसरी
स्त्री को वह सम्मान नहीं देता है तो वह भाषा के साथ ऐसा कैसे कर सकता है.?
अर्थात नहीं कर सकता है .होना तो यह चाहिए कि हम अधिक से अधिक भाषा सीखने को
तत्पर रहे पर निज भाषा कि उन्नति की ओर प्रयास करते रहे भाषा राजनीति का प्रश्न
न हो कर संस्कृति का विषय बननी चाहिए .इसके लिए विभिन्न भाषाओँ के साहित्य का
आदान प्रदान होना चाहिए. और इसके लिए पढने की आदत डालनी चाहिए.जो आजकल समाप्त
हो रही है.इस ओर भी प्रयास करना होगा .

बिपिन कुमार सिन्हा



dr. madhusudan

भाषा परिवर्तन परिष्कृति (संस्कृत-संस्कृति) की दिशा में हो, विकृति की दिशामें
नहीं.

(१) "मिडिया" शब्द तो हमारे माध्यम का ही अंग्रेज़ी बना "मीडियम" शब्दका बहुवचन
है. उसे हम वापस उधार ले रहे हैं.

वाह वाह.

जो अन्ग्रेजी ने हम से लिया था, उसी को वापस?

इस से अधिक बुद्धूपना क्या हो सकता है?

(२) उसी प्रकार हमारे "केंद्र" से ही अंग्रेज़ी C E N T R E (केंत्र -केंटर –और
बाद में सेंटर बना) बड़ी कृतज्ञता से, उसे वापस ला रहे हैं, सेंटर शब्द स्वीकार
कर ?

(३) हमारे माध्यम शब्दसे माध्यमिक, मध्यम, माध्यमिकता. माध्यमि, मध्यावधि,
सुमध्य, मध्यांतर, माध्यमीय, मध्यस्थ, मध्यस्थी—-ऐसे १६० तक, अनेक शब्द साथ
मिलकर, अपना पूरा परिवार हमारी सेवामें तैयार हो जाता है|

—-कोई ऐसा, "मिडिया" शब्द से कर के दिखाए|

(४) ऐसा ही केंद्र से भी किया जा सकता है.

(५) अंग्रेजी को दीये हुए, शब्दों को ही अलग रूपमें वापस लाकर देने वाली हिंदी
को ही भिखारन बना दिया?

सारे संचार माध्यम के अज्ञानियों को प्रशिक्षित करना पड़ेगा.

यह भाषा प्रदुषण क्षमा की योग्यता नहीं रखता.

बड़ी देर भई है भाई –बड़ी देर भई है.

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जानिए मल्टी ब्रांड रिटेल्स वाली कंपनिया जैसे वालमार्ट कैसे काम करती हैं - सरकार इस शीतकालीन सत्र में पास करना चाहती है........

जानिए मल्टी ब्रांड रिटेल्स वाली कंपनिया जैसे वालमार्ट कैसे काम करती हैं जिसे सरकार इस शीतकालीन सत्र में  पास करना चाहती है... जरुर पढ़ें..अग्रेषित करे......

१-इन कंपनियों के पास बहुत पैसा होता है और देश का कानून इनके हाथ में होता है.
२-ये  उत्पादको  से सीधे  उत्पाद खरीद कर जमा कर लेते है बहुत सस्ते रेट में.
३-जब बाजार में सामान की कमी हो जाती है तो उसके भाव बढ़ जाते है,        जैसे प्याज  ४० रुपये किलो बिकेगा.
४- ये कंपनिया अपने जमा स्टाक से प्याज निकालकर ३८/- किलो बेचेगी और रोज अखबार में विज्ञापन आयेगा की वालमार्ट प्याज ३८/- में बेच रही है. जबकि खुले बाजार में प्याज ४०/- किलो है.
५- बड़ी कंपनियों का यही रवैया पूरे विश्व में है, भारत में यह करना बहुत आसान है क्योकि यहाँ पर नेता चोर है.
६-हमारे समाज के गरीब दुकानदार  और  ठेलेवाले अपना व्यवसाय बंद हो जाने के कारण चोरी डकैती और राहजनी करना शुरू कर देंगे क्योकि  वालमार्ट के आने से छोटे व्यापारियों ठेले वाले  की दुकानदारी बंद होनी ही है.
यह ठगी  बंद होना चाहिए  - इसके कांग्रेस को सत्ता विहीन करना ही होगा..
जय भारत

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खतरनाक खानपान को जानिए और सभी को बताइए |


खतरनाक खानपान को जानिए और सभी को बताइए |

अधिकतर चॉकलेट Whey Powder से बनाई जाती हैं | Cheese बनाने की प्रक्रिया में Whey Powder एक सहउत्पाद है | अधिकतर Cheese भी युवा स्तनधारियों के Rennet से बनाया जाता है | Rennet युवा स्तनधारियों के पेट में पाया जाने वाला एंजाइमों का एक प्राकृतिक समूह है, जो माँ के दूध को पचाने के काम आता है | इसका उपयोग Cheese बनाने में होता है |
अधिकतर Rennet को गाय के बछड़े से प्राप्त किया जाता है, क्योंकि उसमे गाय के दूध को पचाने की बेहतर प्रवृति होती है | (मित्रों यहाँ Cheese व पनीर में बहुत बड़ा अंतर है, इसे समझें | ) आजकल हम भी बच्चों के मूंह चॉकलेट लगा देते हैं, बिना यह जाने की इसका निर्माण कैसे होता है ? दरअसल यह सब विदेशी कंपनियों के ग्लैमर युक्त विज्ञापनों का एक षड्यंत्र है | जिन्हें देखकर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग इनके मोह में ज्यादा पड़ते हैं |

  • आजकल McDonald, Pizza Hut, Dominos, KFC के खाद्द पदार्थ यहाँ भारत में भी काफी प्रचलन में हैं | तथाकथित आधुनिक लोग अपना स्टेटस दिखाते हुए इन जगहों पर बड़े अहंकार से जाते हैं | कॉलेज के छात्र-छात्राएं अपनी Birth Day Party दोस्तों के साथ यहाँ न मनाएं तो इनकी नाक कट जाती है | वैसे इन पार्टियों में अधिकतर लडकियां ही होती हैं क्योंकि लड़के तो उस समय बीयर बार में होते हैं| मैंने भी अपने बहुत से मित्रों व परिचितों को बड़े शौक से इन जगहों पर जाते देखा है, बिना यह जाने कि ये खाद्द सामग्रियां कैसे बनती हैं ?
  • यहाँ जयपुर में ही मांस का व्यापार करने वाले एक व्यक्ति से एक बार पता चला कि किस प्रकार वे लोग मांस के साथ साथ पशुओं की चर्बी से भी काफी मुनाफा कमाते हैं | ये लोग चर्बी को काट काट कर कीमा बनाते हैं व बाद में उससे घी व चीज़ बनाते हैं | मैंने पूछा कि इस प्रकार बने घी व चीज़ का सेवन कौन करता है ? तो उसने बताया कि McDonald, Pizza Hut, Dominos आदि इसी घी व चीज़ का उपयोग अपनी खाद्द सामग्रियों में करते हैं व वे इसे हमसे भी खरीदते हैं |
  • इसके अलावा सूअर के मांस से सोडियम इनोसिनेट अम्ल का उत्पादन होता है, जिससे भी खाने पीने की बहुत सी वस्तुएं बनती हैं | सोडियम इनोसिनेट एक प्राकृतिक अम्ल है जिसे औद्योगिक रूप से सूअर व मछली से प्राप्त किया जाता है | इसका उपयोग मुख्यत: स्वाद को बढाने में किया जाता है | बाज़ार में मिलने वाले बेबी फ़ूड में इस अम्ल को उपयोग में लिया जाता है, जबकि १२ सप्ताह से कम आयु के बच्चों के भोजन में यह अम्ल वर्जित है |
  • इसके अतिरिक्त विभिन्न कंपनियों के आलू चिप्स व नूडल्स में भी यह अम्ल स्वाद को बढाने के लिए उपयोग में लाया जाता है | नूडल्स के साथ मिलने वाले टेस्ट मेकर के पैकेट पर इसमें उपयोग में लिए गए पदार्थों के सम्बन्ध में कुछ नहीं लिखा होता | Maggi कंपनी का तो यह कहना था कि यह हमारी सीक्रेट रेसिपी है | इसे हम सार्वजनिक नहीं कर सकते |
  • चुइंगम जैसी चीज़ें बनाने के लिए भी सूअर की चर्बी से बने अम्ल का उपयोग किया जाता है |  इस प्रकार की वस्तुओं को प्राकृतिक रूप से तैयार करना महंगा पड़ता है अत: इन्हें पशुओं से प्राप्त किया जाता है |
  • Disodium Guanylate (E-627) का उत्पादन सूखी मछलियों व समुद्री सेवार से किया जाता है, इसका उपयोग ग्लुटामिक अम्ल बनाने में किया जाता है |
  • Dipotassium Guanylate (E-628) का उत्पादन सूखी मछलियों से किया जाता है, इसका उपयोग स्वाद बढाने में किया जाता है |
  • Calcium Guanylate (E-629) का उत्पादन जानवरों की चर्बी से किया जाता है, इसका उपयोग भी स्वाद बढाने में किया जाता है |
  • Inocinic Acid (E-630) का उत्पादन सूखी मछलियों से किया जाता है, इसका उपयोग भी स्वाद बढाने में किया जाता है |
  • Disodium Inocinate (e-631) का उत्पादन सूअर व मछली से किया जाता है, इसका उपयोग चिप्स, नूडल्स में चिकनाहट देने व स्वाद बढाने में किया जाता है |
  • इन सबके अतिरिक्त शीत प्रदेशों के जानवरों के फ़र के कपडे, जूते आदि भी बनाए जाते हैं | इसके लिए किसी जानवर के शरीर से चमड़ी को खींच खींच कर निकाला जाता है व जानवर इसी प्रकार ५-१० घंटे तक खून से लथपथ तडपता रहता है | तब जाकर मखमल कोट व कपडे तैयार होते हैं और हम फैशन के नाम पर यह पाप पहने मूंह उठाए घुमते रहते हैं |

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देखो फिर से नभ की ओर

चेहरा क्यूँ दिखता कमजोर।
देखो फिर से नभ की ओर।।

तारे जहाँ सदा हँसते हैं,
और चमकता चंदा।
जी सकते तो जी लो ऐसे,
छूटेगा हर फंदा।
आग उगलता सूरज फिर भी,
लेकर आता नूतन भोर।।
देखो फिर से नभ की ओर।।

नदियों की खुशियाँ तो देखो,
गीत हमेशा गाती है।
हर विरोध के पत्थर को भी,
सँग बहा ले जाती है।
तब उसकी मस्ती बढ़ती जब,
घटा घिरे घनघोर
देखो फिर से नभ की ओर।।

भले तोड़ ले कोई सुमन को,
फिर भी वह तो हँसता है।
और सुगंध भी कैद नहीं है,
हवा के सँग सँग बहता है।
चिड़ियों की कलरव में धुन है,
मत कहना तू शोर।।
देखो फिर से नभ की ओर।।

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